Editorial Calls for Sharper Policy Focus on ISRO’s Future

The Hindu editorial on Sep 30 urges the government to define a clear strategic framework, funding model and governance structure for India’s space agency.
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नई दिल्ली — बुधवार, 30 सितंबर 2026 को प्रकाशित द हिंदू के एक संपादकीय में भारतीय सरकार से आग्रह किया गया कि वह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के लिए एक व्यापक नीति ढाँचा तैयार करे। लेख में तर्क दिया गया कि स्पष्ट रणनीतिक दिशा, पूर्वानुमेय वित्तपोषण और पारदर्शी शासन भारत की बढ़ती उपग्रह प्रक्षेपण सेवाओं, गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण और रक्षा‑संबंधी अंतरिक्ष क्षमताओं के लक्ष्यों को बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं।

नीति अंतराल पर प्रकाश

संपादकीय ने उल्लेख किया कि यद्यपि ISRO ने हाल के वर्षों में गगनयान चालक दल कार्यक्रम और चंद्रयान‑3 चंद्र रोवर सहित कई प्रमुख मिशन सफलतापूर्वक पूरे किए हैं, फिर भी यह संस्था बिना किसी औपचारिक, दीर्घकालिक नीति दस्तावेज़ के कार्य कर रही है जो इसके वैज्ञानिक, वाणिज्यिक और सुरक्षा उद्देश्यों को समन्वित करता हो। ऐसी नीति के अभाव से निजी साझेदारों के लिए अनिश्चितता पैदा होती है, दीर्घकालिक योजना में बाधा आती है और भारत की उभरती वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता सीमित हो सकती है।

वित्तीय स्थिरता की माँग

लेख के अनुसार, ISRO का वार्षिक बजट लगातार बढ़ रहा है, पर संपादकीय ने चेतावनी दी कि आकस्मिक आवंटन बहु‑वर्षीय परियोजनाओं को बाधित कर सकते हैं। इसने एक बहु‑वर्षीय वित्तीय योजना की माँग की, जो पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण वाहन (RLV) और अगली पीढ़ी के नेविगेशन उपग्रहों जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के लिए संसाधनों को सुरक्षित करे। लेख ने वाणिज्यिक प्रक्षेपण सेवाओं के लिए पारदर्शी लागत‑पुनर्प्राप्ति मॉडल की आवश्यकता पर प्रकाश डाला, यह सुझाव देते हुए कि पूर्वानुमेय मूल्य निर्धारण अधिक विदेशी और घरेलू ग्राहकों को आकर्षित कर सकता है।

शासन सुधारों की सिफारिशें

संपादकीय में सरकार से सुझाव दिया गया है कि वह इसरो (ISRO) के रणनीतिक योजनाओं, खरीद प्रक्रियाओं और जोखिम प्रबंधन प्रथाओं की समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र निगरानी बोर्ड की स्थापना करे। इसका तर्क दिया गया है कि ऐसा एक निकाय एजेंसी की तकनीकी स्वायत्तता को बनाए रखते हुए जवाबदेही सुनिश्चित कर सकता है। लेख में अंतरिक्ष मंत्रालय से भी अनुरोध किया गया है कि वे उपग्रह निर्माण और लॉन्च ऑपरेशनों में निजी कंपनियों की भागीदारी के स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करें, यह नोट करते हुए कि हाल के नीतिगत घोषणाएँ अलग-थलग (fragmented) रही हैं।

रणनीतिक स्वायत्तता और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग

अपने विश्लेषण में, संपादकीय ने जोर दिया कि भारत की अंतरिक्ष नीति को रणनीतिक स्वायत्तता और सहयोगात्मक परियोजनाओं के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप के साथ हाल के संयुक्त मिशनों का उदाहरण दिया गया है, जो यह दर्शाते हैं कि सहयोग राष्ट्रीय सुरक्षा को समझौता किए बिना तकनीकी क्षमता को कैसे बढ़ा सकता है। लेख में चेतावनी दी गई है कि एक सुसंगत नीति के बिना, भारत को अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन और मलबे (debris) को कम करने के वैश्विक मानकों में योगदान देने के अवसरों से वंचित रहना पड़ सकता है।

कानूनी कार्रवाई की मांग

लेख के अंत में संसद से अनुरोध किया गया है कि वह एक समर्पित ‘अंतरिक्ष नीति अधिनियम’ पर विचार करे, जिसमें देश के उद्देश्यों, वित्तपोषण तंत्र और अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए नियामक ढांचे को कानूनी रूप से परिभाषित किया जाए। इसमें सुझाव दिया गया है कि ऐसी विधेयक संसार सार्वजनिक और निजी दोनों पक्षकारों द्वारा दीर्घकालिक निवेश के लिए आवश्यक कानूनी निश्चितता प्रदान कर सकती है।

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