नई दिल्ली — मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय ने स्कूलों में रैगिंग और बुलिंग पर केंद्रीय कानून लागू करने से इनकार कर दिया, जिससे राज्य स्तरीय विधेयकों और दिशानिर्देशों का मौजूदा ढांचा बरकरार रह गया। यह निर्णय तब आया जब माता-पिता और छात्र समूहों के एक गठबंधन द्वारा दायर एक याचिका में इस समस्या को नियंत्रित करने के लिए एक राष्ट्रीय स्तर के अनिवार्य कानून की मांग की गई थी, जो लंबे समय से भारतीय विद्यालयों को प्रभावित कर रही है।
समस्या का पृष्ठभूमि
रैगिंग, जो नए छात्रों के साथ शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न की एक रूप है, भारतीय शैक्षणिक संस्थानों में एक लगातार चिंता का विषय रही है। वर्ष 2015 में, न्यायालय ने पहले ही निर्णय दिया था कि स्कूलों को बाल यौन अपराधों की रोकथाम अधिनियम (POCSO) और सुरक्षित विद्यालयों की राष्ट्रीय नीति के तहत प्रति-रैगिंग उपाय अपनाने होंगे। वर्तमान याचिका में तर्क दिया गया था कि एक समान केंद्रीय कानून प्रवर्तन को मानकीकृत करेगा और स्पष्ट दंड प्रदान करेगा।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
अपने निर्णय में, न्यायालय ने उल्लेख किया कि कई राज्यों में पहले से ही रैगिंग को अपराध मानने वाले कानून मौजूद हैं, और वर्ष 2018 में जारी सुरक्षित विद्यालयों की राष्ट्रीय नीति रोकथाम और दंड के लिए एक व्यापक ढांचा प्रदान करती है। पीठ ने यह माना कि इस चरण में एक केंद्रीय अधिनियम आवश्यक नहीं है और मौजूदा प्रावधान इस समस्या को संबोधित करने के लिए पर्याप्त हैं। न्यायालय ने यह भी जोर दिया कि इस मामले को राज्यों पर छोड़ा जाना चाहिए, जो स्थानीय संदर्भों के अनुसार उपायों को अनुकूलित कर सकते हैं।
विद्यालयों और अभिभावकों के लिए निहितार्थ
अदालत के हस्तक्षेप से इनकार के साथ, विद्यालय राज्य कानूनों और राष्ट्रीय नीति पर निर्भर रहेंगे जो रैगिंग के खिलाफ प्रोटोकॉल निर्धारित करती है। अभिभावकों और छात्र निकायों से अपेक्षा की जाती है कि वे इन उपायों को लागू करने के लिए स्थानीय प्राधिकरणों के साथ मिलकर कार्य करें। यह निर्णय हाल के बदमाशी के मामलों की चल रही जांचों पर, जिन्हें मीडिया ने ध्यान दिया है, प्रभाव डालने की संभावना कम है।
हितधारकों की प्रतिक्रियाएँ
हालांकि कुछ शिक्षा अधिकारियों ने अदालत के निर्णय का स्वागत किया, यह तर्क देते हुए कि एक केंद्रीय कानून नौकरशाही विलंब पैदा कर सकता है, अन्य ने निराशा व्यक्त की। एक छात्र अधिकार संगठन के प्रतिनिधि ने कहा कि राष्ट्रीय कानून एकरूपता और अधिक सशक्त निवारण लाएगा। अदालत का निर्णय भविष्य के विधायी प्रयासों को रोकता नहीं है, और कई विधायकों ने संकेत दिया है कि वे सख्त नियमों के लिए प्रयास जारी रखेंगे।
कानूनी संदर्भ और भविष्य की संभावनाएँ
सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्रीय कानून पारित न करने से भविष्य के विधेयक की संभावना समाप्त नहीं होती। सरकार ने पहले ही विद्यालय सुरक्षा पर एक मसौदा बिल घोषित किया है, जिसे इस वर्ष बाद में संसद में पेश किया जाने की उम्मीद है। जब तक ऐसा बिल लागू नहीं होता, मौजूदा कानूनी ढाँचा विद्यालयों में रैगिंग और बदमाशी से निपटने के लिए प्राथमिक साधन बना रहेगा।
प्राथमिक स्रोत एवं आधिकारिक दस्तावेज़
- Supreme Court Declines Plea for Central Law on School Ragging and Bullying
- Supreme Court Refuses To Interfere With Ex-CM Bhupesh Baghel Plea For Now, Leaves Limitati
- Supreme Court Refuses Stay On UPI Charges Above Rs 2,000. What It Means For You – NDTV
- Bombay High Court Refuses Urgent Hearing Of Plea Challenging 14 Orders By CEC Gyanesh Kuma