नई दिल्ली — द हिन्दू, 28 सितंबर 2026 को Accredited Wire के विश्लेषण का हवाला देते हुए, कहता है कि भारत की उच्च‑शिक्षा प्रणाली को संकाय को कृत्रिम‑बुद्धिमत्ता युग के लिए तैयार करने हेतु अपनी भर्ती और प्रशिक्षण प्रक्रियाओं का पुनर्गठन करना आवश्यक है। लेख में कहा गया है कि वर्तमान ढांचा, जो मुख्यतः 1970 के दशक से विरासत में मिला है, शिक्षकों को पाठ्यक्रम या अनुसंधान में AI उपकरणों को एकीकृत करने के लिए आवश्यक डिजिटल कौशल से लैस नहीं करता।
परिवर्तन की तात्कालिकता क्यों है
यह लेख तर्क देता है कि AI इंजीनियरिंग से लेकर मानविकी तक के विषयों को पुनः आकार दे रहा है, जिससे नई शैक्षणिक पद्धतियों और अनुसंधान कार्यप्रणालियों की आवश्यकता उत्पन्न होती है। यह जोर देता है कि यदि भर्ती मानदंडों को व्यवस्थित रूप से अद्यतन नहीं किया गया, तो भारतीय विश्वविद्यालय वैश्विक समकक्षों से पीछे रह जाएंगे, जो पहले ही संकाय विकास कार्यक्रमों में AI क्षमताओं को सम्मिलित कर चुके हैं।
प्रस्तावित सुधार
रिपोर्ट के अनुसार, सरकार को एक कौशल‑आधारित चयन ढांचा पेश करना चाहिए जो डिजिटल साक्षरता, डेटा विश्लेषण और अंतःविषय सहयोग को प्राथमिकता दे। यह नई नियुक्त प्रोफेसरों के लिए अनिवार्य AI प्रशिक्षण मॉड्यूल और मौजूदा स्टाफ के लिए निरंतर व्यावसायिक विकास की भी सिफारिश करता है।
संस्थागत प्रतिक्रिया
हालाँकि लेख में विश्वविद्यालय के अधिकारियों के उद्धरण नहीं हैं, यह उल्लेख करता है कि कई संस्थानों ने ऐसे पायलट कार्यक्रम शुरू किए हैं जो संकाय को एआई विशेषज्ञों के साथ जोड़ते हैं। ये पायलट एआई उपकरणों को शिक्षण और अनुसंधान कार्यप्रवाह में एकीकृत करने की व्यवहार्यता का परीक्षण करने का लक्ष्य रखते हैं।
नीति प्रभाव
विश्लेषण से पता चलता है कि शिक्षा मंत्रालय संकाय नियुक्तियों के लिए एआई दक्षता मानकों को अनिवार्य करने वाला एक आदेश जारी कर सकता है। यह एआई अनुसंधान प्रयोगशालाओं के लिए बढ़ी हुई वित्तीय सहायता और उद्योग के साथ साझेदारी की भी मांग करता है, जिससे व्यावहारिक अनुभव प्रदान किया जा सके।