भारतीय कक्षाओं में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को भारी भीड़ और कनेक्टिविटी की बाधाओं का सामना

सीबीएसई कृत्रिम बुद्धिमत्ता‑आधारित शिक्षण साधनों पर विचार कर रहा है, परन्तु शिक्षकों ने चेतावनी दी है कि बड़े वर्ग और खराब इंटरनेट इस प्रौद्योगिकी को लागू करना कठिन बना देते हैं।
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नई दिल्ली — भारत के विभिन्न विद्यालयों में कृत्रिम‑बुद्धि (AI) उपकरणों का परीक्षण चल रहा है, परन्तु शिक्षकों का मानना है कि यह प्रौद्योगिकी अभी मानव शिक्षण को प्रतिस्थापित करने के लिये तैयार नहीं है। यह कदम केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा कृत्रिम‑बुद्धि‑आधारित शिक्षण सहायता के लिये दिशा‑निर्देश तैयार करने के बीच आया है, जबकि ग्रामीण जिलों के विद्यालय अत्यधिक भीड़भाड़ वाले कक्षाओं और सीमित इंटरनेट कनेक्टिविटी से जूझ रहे हैं।

AI उपकरणों को बुनियादी ढाँचे की कमी का सामना, जब स्कूल बड़े वर्गों से जूझ रहे हैं

पिछले महीने घोषित एक पायलट कार्यक्रम के अंतर्गत, CBSE ने कुछ ही विद्यालयों को AI‑संचालित ट्यूटोरिंग सिस्टम उपयोग करने की अनुमति दी है, जो व्यक्तिगत छात्र की आवश्यकताओं के अनुसार पाठ्यक्रम को अनुकूलित कर सकते हैं। बोर्ड का कहना है कि यह पहल शिक्षकों को प्रतिस्थापित करने के लिये नहीं, बल्कि उनका पूरक बनने के लिये है। “उद्देश्य उन छात्रों को व्यक्तिगत सहायता प्रदान करना है जो पीछे रह जाते हैं,” CBSE के एक प्रवक्ता ने प्रेस को ई‑मेल में कहा। यह पायलट छह महीने तक देश के 20 विद्यालयों में चलाया जाएगा, और बोर्ड व्यापक कार्यान्वयन से पहले परिणामों की समीक्षा करेगा।

हालाँकि, वास्तविकता बहुत अलग है। बिहार के रोहतास जिले में, पटना के एक सरकारी विद्यालय में केवल एक कक्षा में 82 छात्र एक ही ब्लैकबोर्ड के साथ पढ़ रहे हैं। द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस भीड़भाड़ के कारण शिक्षकों के लिये बुनियादी कक्षा कार्यों का प्रबंधन भी कठिन हो जाता है, जबकि स्थिर इंटरनेट कनेक्शन और प्रत्येक छात्र के लिये व्यक्तिगत उपकरणों की आवश्यकता वाले परिष्कृत AI उपकरणों को पेश करना तो दूर की बात है।

क्षेत्र के शिक्षकों का कहना है कि बुनियादी ढाँचे की कमी एक प्रमुख बाधा है। “हम

संयोजनता विद्यालयों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के लिए एक प्रमुख सक्षम कारक है

स्पेसएक्स द्वारा संचालित उपग्रह ब्रॉडबैंड सेवा स्टारलिंक ने हाल ही में घोषणा की है कि वह भारत में अपनी सेवाओं को शुरू करने के लिए तैयार है। कंपनी के सीईओ एलन मस्क ने एक बयान में कहा कि प्रारंभ में विलंब “ओलिगार्किक” हस्तक्षेप के कारण हुआ है, हालांकि स्पेसएक्स ने पुष्टि की है कि नियामक अनुमोदनों के प्राप्त होने के बाद यह सेवा विद्यालयों के लिए उपलब्ध होगी। यह नया संयोजनता विकल्प ग्रामीण क्षेत्रों में AI के कार्यान्वयन को बाधित करने वाले डिजिटल अंतर (digital divide) को कम करने में सहायक हो सकता है।

राज्य शिक्षा विभाग इस स्थिति का सावधानीपूर्वक निरीक्षण कर रहे हैं। शिक्षा मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा, “हम कम सेवा प्राप्त क्षेत्रों में संयोजनता को बेहतर बनाने के लिए निजी ब्रॉडबैंड प्रदाताओं के साथ साझेदारियों का पता लगा रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा, “उच्च-गति इंटरनेट की उपलब्धता किसी भी AI-आधारित शिक्षण मंच के लिए एक पूर्व शर्त है।

इसके बीच, CBSE ने एक प्रारंभिक दिशा-निर्देश जारी किया है जिसमें विद्यालयों को AI टूल्स का उपयोग करने से पहले न्यूनतम 20 विद्यार्थियों के लिए एक कंप्यूटर और स्थिर ब्रॉडबैंड कनेक्शन की आवश्यकता है। इस दिशा-निर्देश में शिक्षकों को प्रभावी ढंग से अपने पाठ योजनाओं में AI को एकीकृत करने में सक्षम बनाने के लिए शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों का भी प्रावधान है।

यंत्र-चालित दुनिया के लिए चुनौतियां बनी हुई हैं

AI के प्रति उत्साद के बावजूद, कई हितधारक यह संकेत देते हैं कि शैक्षणिक अनुप्रयोगों के संदर्भ में यह प्रौद्योगिकी अभी भी अपने शुरुआती चरण में है। वर्तमान में उपलब्ध AI प्रणालियों का डिज़ाइन मुख्य रूप से भाषा शिक्षा और बुनियादी कौशल मूल्यांकन के लिए किया गया है, और इनमें माध्यमिक स्तर पर गणित और विज्ञान जैसी जटिल विषयों को संभालने की क्षमता की कमी है।

इसके अलावा, AI बुनियादी ढांचे के कार्यान्वयन की लागत—हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर लाइसेंस और प्रशिक्षण—उन विद्यालयों के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय बोझ है जो पहले से ही कठोर बजट पर संचालित हो रहे हैं। एक विद्यालय प्रशासक ने कहा, “जब तक हमें बुनियादी शिक्षण सामग्री खरीदने की आवश्यकता है, तब तक हम महंगे AI प्रणालियों में निवेश नहीं कर सकते।”

जैसे-जैसे भारत अधिक प्रौद्योगिकी-चालित शिक्षा प्रणाली की ओर बढ़ रहा है, नवाचार और व्यावहारिकता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, इस पर चर्चा जारी है। CBSE का पायलट परियोजना कक्षाओं में AI की व्यवहार्यता पर मूल्यवान डेटा प्रदान करेगा, लेकिन भीड़भाड़, संयोजनता और लागत की चुनौतियां संभवतः अपनाने की गति को प्रभावित करेंगी।

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