नई दिल्ली — 28 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त पैनलों द्वारा जारी रिपोर्ट में पाया गया कि देशभर में सर्वेक्षण किए गए छात्रों में से 9% ने आत्महत्या के विचारों को स्वीकार किया। यह निष्कर्ष 12 से 18 वर्ष आयु के 10,000 से अधिक छात्रों के राष्ट्रीय सर्वेक्षण पर आधारित है, और यह भारतीय विद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य के माहौल को लेकर चिंताएँ बढ़ाता है।
सर्वेक्षण की पद्धति और प्रमुख निष्कर्ष
पैनल, जिनमें मनोवैज्ञानिक, शिक्षाविद् और कानूनी विशेषज्ञ शामिल थे, ने शहरी, अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के 150 विद्यालयों के नमूने में सर्वेक्षण किया। उत्तरदाताओं से तनाव, धमकियाँ, शैक्षणिक दबाव और मानसिक स्वास्थ्य लक्षणों के बारे में गोपनीय प्रश्नों की एक श्रृंखला पूछी गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि 9% उत्तरदाताओं ने पिछले वर्ष में आत्महत्या के विचारों की सूचना दी। यह आंकड़ा निजी विद्यालयों के छात्रों (12
शिक्षकों और गैर‑सरकारी संगठनों से त्वरित कार्रवाई का आह्वान
रिपोर्ट जारी होने के बाद, कई शैक्षिक NGOs ने सरकार से शीघ्र कार्रवाई करने का आग्रह किया। नेशनल एसोसिएशन ऑफ टीचर्स’ कॉलेजेज (NATC) ने कहा कि स्कूलों को “२४/७ हेल्पलाइन और संकट‑हस्तक्षेप टीमें” प्रदान करनी चाहिए। इस NGO ने शैक्षणिक दबाव को कम करने के लिए बेहतर शिक्षक‑छात्र अनुपात की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला।
एक संबंधित लेख में, हिंदुस्तान टाइम्स ने बताया कि देश भर के स्कूल यह बहस कर रहे हैं कि अधिक छत‑पंखे स्थापित किए जाएँ या परामर्श पर अधिक ध्यान दिया जाए। इस लेख ने यह रेखांकित किया कि बुनियादी ढाँचे में सुधार महत्वपूर्ण है, परन्तु छात्र आत्महत्या को रोकने के लिए मानसिक‑स्वास्थ्य समर्थन अनिवार्य है। इसने भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान (Indian Institute of Public Health) के एक अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें स्कूल‑आधारित परामर्श कार्यक्रमों के परिचय के बाद स्वयं‑रिपोर्टेड तनाव में ३० % की कमी पाई गई।